विश्‍वकर्मा आरती | Vishwakarma Aarti PDF in Hindi

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Vishwakarma Aarti & Katha PDF: हिंदू धर्म में विश्वकर्मा जी को सबसे महान दर्जा दिया गया है क्योंकि इन्हें निर्माण एवं सृजन का देवता माना जाता है मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि इन्होंने ही रावण की सोने की लंका का निर्माण किया था और यह सोने की लंका पूरे विश्व में सबसे ज्यादा आकर्षित मानी गई विश्वकर्मा जी की तीन पुत्रियां थी रिद्धि सिद्धि और संज्ञा।

जिनमें से रिद्धि सिद्धि का विवाह भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र भगवान गणेश जी से हुआ तथा संज्ञा का विवाह महर्षि कश्यप के पुत्र भगवान सूर्यनारायण से हुआ भगवान विश्वकर्मा जी को देव शिल्पी जगत करता और शिल्पेश्वरके नाम से भी जाना जाता है भगवान विश्वकर्मा जी के माता पिता ब्रह्मा और सरस्वती जी थे प्रत्येक वर्ष 17 सितंबर को भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा की जाती है।

हिंदू धर्म में यह माना जाता है कि विश्वकर्मा जी ने ही ब्रह्मांड की वास्तु की रचना की थी इसीलिए इन्हें विश्वकर्मा जयंती समर्पित है क्योंकि विश्वकर्मा जी को वास्तुकार के रूप में जाना जाता है इसी को देखते हुए उन्होंने कई नगरों और भवनों का निर्माण किया जैसे सतयुग में उन्होंने स्वर्ग लोक का निर्माण किया त्रेता युग में उन्होंने रावण की लंका का निर्माण किया द्वापर युग में द्वारका का निर्माण किया तथा कलयुग में हस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ जैसे शहरों का निर्माण किया विश्वकर्मा जी ने ही जगन्नाथ पुरी में जगन्नाथ मंदिर स्थित कृष्ण, सुभद्रा तथा बलराम का निर्माण किया।

विश्वकर्मा जी की आरती करने वाला व्यक्ति हमेशा सुखी रहता है तथा उसके सभी घर सम्बन्धी कार्य बिना किसी विघ्न के पुरे हो जाते है।

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विश्‍वकर्मा की आरती (Vishwakarma Aarti)

ॐ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु जय श्री विश्वकर्मा।
सकल सृष्टि के कर्ता रक्षक श्रुति धर्मा ॥

आदि सृष्टि में विधि को, श्रुति उपदेश दिया।
शिल्प शस्त्र का जग में, ज्ञान विकास किया ॥

ऋषि अंगिरा ने तप से, शांति नही पाई।
ध्यान किया जब प्रभु का, सकल सिद्धि आई॥

रोग ग्रस्त राजा ने, जब आश्रय लीना।
संकट मोचन बनकर, दूर दुख कीना॥

जब रथकार दम्पती, तुमरी टेर करी।
सुनकर दीन प्रार्थना, विपत्ति हरी सगरी॥

एकानन चतुरानन, पंचानन राजे।
द्विभुज, चतुर्भुज, दशभुज, सकल रूप साजे॥

ध्यान धरे जब पद का, सकल सिद्धि आवे।
मन दुविधा मिट जावे, अटल शांति पावे॥

श्री विश्वकर्मा जी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत गजानन स्वामी, सुख सम्पत्ति पावे॥

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