वट सावित्री व्रत कथा 2023 | Vat Savitri Vrat Katha PDF in Hindi

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Today, through this article, we are going to share the Vat Savitri Vrat Katha PDF in Hindi with you. If you want to download the complete Vrat Katha, you can do so through the link provided below.

वट सावित्री व्रत भारत का एक प्रमुख हिंदू त्यौहार है जिसे मुख्य रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश तथा महाराष्ट्र राज्य में धूमधाम से मनाया जाता है। यह त्यौहार प्रमुख रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। यह त्यौहार ज्येष्ठ के महीने में अमावस के दिन पड़ता है जो कि आमतौर पर मई या जून में पड़ता है।

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इस वर्ष वट सावित्री का व्रत 19 मई 2023 शुक्रवार को सुहागिन महिलाएं वट सावित्री व्रत रखेंगी और विधि विधान से बरगद के पेड़ की पूजा करेंगी। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं। यह व्रत मुख्य रूप से सती सावित्री को समर्पित किया गया है। ऐसा माना जाता है कि जेष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को ही सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से बचाए थे। तभी से इस दिन पर लोग वट सावित्री व्रत रखते हैं और ऐसा करने अखंड सौभाग्यवती का वरदान प्राप्त होता है।

वट सावित्री व्रत के दौरान, विवाहित महिलाएं बरगद के पेड़ के चारों ओर धागे बांधती हैं, पूजा करती हैं और सावित्री की भक्ति का सम्मान करते हुए अनुष्ठान करती हैं। इस दिन उपवास रखा जाता है और धर्मार्थ जैसी गतिविधियों में संलग्न होती है। इस त्यौहार को प्रेम प्रतिबद्धता और विवाह की पवित्रता के उत्सव के रूप में देखा जाता है।

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वट सावित्री व्रत कथा | Vat Savitri Vrat Katha

पौराणिक कथाओं के अनुसार मद्रदेश में अश्वपति नामक एक धर्मात्मा राजा का राज्य था। उसकी कोई भी संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए उसने बहुत बड़ा यज्ञ करवाया जिसके फलस्वरूप उसे कुछ समय पश्चात उसे एक कन्या की प्राप्ति हुई जिसका नाम उसने सावित्री रखा। बाद में चलकर सावित्री का विवाह द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान से हुआ। सत्यवान के पिता राजा अवश्य थे लेकिन बाद में उनका राज पाठ छीन लिया गया। जिससे वे लोग बहुत ही दरिद्र हो गए और अपना जीवन दरिद्रता में ही व्यतीत करने लगे। सत्यवान के माता-पिता की आंखों की रोशनी चली गई थी। सत्यवान जंगलों से लकड़ी काटकर उन्हें बेचते और अपना गुजारा करते थे।

जब सावित्री और सत्यवान का विवाह की बातें हुई थी तब नारद मुनि जी ने सावित्री के पिता राजा अश्वपति को बताया था कि सत्यवान कि आयु अल्पायु है और विवाह के 1 वर्ष के पश्चात ही उनकी मृत्यु हो जाएगी। यह बात सावित्री के पिता ने सावित्री को बताई और समझाने का बहुत प्रयास किया लेकिन यह सब जानने के बावजूद भी वह अपने निर्णय पर अडिग रही। और अंततः सावित्री और सत्यवान का विवाह हो गया।

समय बीतता गया और वह दिन आ गया जो नारद मुनि ने सत्यवान की मृत्यु के लिए बताया था। उसी दिन सावित्री भी सत्यवान के साथ वन में गई। वन में सत्यवान लकड़ी काटने के लिए जैसे ही पेड़ पर चढ़ा तो उसके सिर में असहनीय पीड़ा होने लगी, और सावित्री ने अपने पति का सर गोद में रख लिया। कुछ ही समय बाद यमराज अपने दूतों के साथ वहां प्रकट हो गए और यमराज सत्यवान की आत्मा को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चलने लगे तो उनके साथ सावित्री भी उनका पीछा करने लगी।

आगे रास्ते में यमराज ने सावित्री से कहा एक पतिव्रता नारी, जहां तक मनुष्य साथ दे सकता है तुमने अपने पति का साथ दे दिया अब तुम लौट जाओ। इस पर सावित्री ने कहां जहां तक मेरे पति जाएंगे, वहां तक मुझे जाना चाहिए। यही सनातन सत्य है। यमराज सावित्री की यह वाणी सुनकर प्रसन्न हो गए और उन्होंने उससे तीन बार मांगने को कहा। सावित्री ने कहा, ‘मेरे सास-ससुर अंधे हैं, उन्हें नेत्र-ज्योति दें’ यमराज ने ‘तथास्तु’ कहकर उसे लौट जाने को कहा और आगे बढ़ने लगे। किंतु सावित्री यम के पीछे ही चलती रही । यमराज ने प्रसन्न होकर पुन: वर मांगने को कहा। सावित्री ने वर मांगा, ‘मेरे ससुर का खोया हुआ राज्य उन्हें वापस मिल जाए।

इसके बाद सावित्री ने यमदेव से वर मांगा, ‘मैं सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनना चाहती हूं। कृपा कर आप मुझे यह वरदान दें’ सावित्री की पति-भक्ति से प्रसन्न हो सावित्री से तथास्तु कहा, जिसके बाद सावित्री न कहा कि मेरे पति के प्राण तो आप लेकर जा रहे हैं तो आपके पुत्र प्राप्ति का वरदान कैसे पूर्ण होगा। तब यमदेव ने अंतिम वरदान को देते हुए सत्यवान की जीवात्मा को पाश से मुक्त कर दिया। सावित्री पुनः उसी वट वृक्ष के लौटी तो उन्होंने पाया कि वट वृक्ष के नीचे पड़े सत्यवान के मृत शरीर में जीव का संचार हो रहा है। कुछ देर में सत्यवान उठकर बैठ गया। उधर सत्यवान के माता-पिता की आंखें भी ठीक हो गईं और उनका खोया हुआ राज्य भी वापस मिल गया।

वट सावित्री व्रत पूजन विधि | Vat Savitri Vrat Puja

  • व्रत के दिन सुहागिन महिलाएं सूर्योदय से पूर्व उठे
  • स्नान आदि करने के पश्चात नए वस्त्रों का धारण करें और श्रृंगार करे
  • बरगद के पेड़ की जड़ को जल का अर्पण करें साथ में फल, गुड़, चना, अक्षत और फूल अर्पित करें
  • इसके पश्चात व्रत सावित्री व्रत कथा का पाठ करें या सुनें।
  • वट के पेड़ के चारों ओर लाल या पीला धागा बांध (7 या 21 बार लपेटे) कर वृक्ष की परिक्रमा करें।
  • परिक्रमा करते समय पति की लंबी आयु की कामना करें।
  • इसके बाद घरों के बड़ों का आशीर्वाद अवश्य लें।

वट सावित्री व्रत पूजा सामग्री (Puja Samagri)

  • एक वट वृक्ष, बरगद का फल
  • सावित्री और सत्यवान की मूर्ति या तस्वीर
  • भिगा हुआ काला चना
  • कलावा या रक्षासूत्र या सफेद कच्चा सूत
  • सवा मीटर का कपड़ा, बांस का पंखा
  • लाल और पीले फूल
  • मिठाई, बताशा, मौसमी फल
  • मिट्टी का दीपक, धूप, दीप, अगरबत्ती
  • सिंदूर, अक्षत, रोली, सवा मीटर का कपड़ा
  • पान का पत्ता, सुपारी, नारियल
  • श्रृंगार सामग्री
  • जल कलश, पकवान, पूड़ी आदि.
  • स्टील या पीतल की थाली
  • वट सावित्री व्रत कथा की पुस्तक

वट सावित्री व्रत पूजा शुभ मुहूर्त

अमावस्या तिथि का प्रारंभ 18 मई को सुबह 9 बजकर 43 मिनट पर होगा और 19 मई को रात 9 बजकर 22 मिनट तक रहेगी। 19 मई को पूजन का शुभ मुहूर्त सुबह 5 बजकर 21 मिनट से लेकर पूरे दिन रहेगा।

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