Bhagavad Gita PDF in Hindi

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PDF NameBhagavad Gita PDF
No of Pages1300
Size7 MB
LangaugeHindi
SourcePDFNotes.co

नमस्कार दोस्तों आज मैं आप सभी को Bhagavad Gita PDF in Hindi देने वाला हूं जिसे आप सबसे नीचे दिए गए लिंक से download कर सकते हैं।

महाभारत युद्ध शुरू होने से ठीक पहले भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को कुछ उपदेश दिए या उपदेश ही भगवद गीता के नाम से प्रसिद्ध है भगवद गीता में कुल 18 अध्याय तथा 700 श्लोक हैं।

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Bhagavad Gita क्यों प्रसिद्ध है?

महाभारत के युद्ध में जब युद्ध शुरू ही होने वाला होता है लेकिन युद्ध शुरू होने से ठीक पहले अर्जुन युद्ध करने से मना कर लेता है तो श्री कृष्ण उन्हें उपदेश देते हुए अर्जुन को बताते हैं कि यह युद्ध कितना जरूरी है तथा इस युद्ध के द्वारा ही अधर्म पर धर्म की जीत संभव है अर्थात भगवान श्री कृष्ण Bhagavad Gita के माध्यम से अर्जुन को युद्ध करने की सलाह देते हैं।

Bhagavad Gita का सार

  • Bhagavad Gita हिंदू धर्म में सबसे बड़ा ग्रंथ माना जाता है।
    Bhagavad Gita में कुल 18 अध्याय जोकि निम्नलिखित है।
    प्रथम अध्याय- प्रथम अध्याय में दोनों सेनाओं का वर्णन किया जाता है शंख बजने के पश्चात अर्जुन जब किसी से रात को सेनाओं के मध्य ले जाने को कहता है तथा उसके बाद कायरता की बात करता है।
  • दूसरे अध्याय- इस अध्याय में अर्जुन की कायरता के विषय में अर्जुन और श्री कृष्ण भगवान जी के बीच संवाद होता है साथ ही इसमें कर्मयोग के बारे में बताया गया है स्थिर बुद्धि व्यक्ति के गुण भी बताए गए हैं।
  • तीसरे अध्याय- इस अध्याय में नित्य कर्म करने वाले की श्रेष्ठता बताई गई है तथा अज्ञानी और ज्ञानी व्यक्तियों के लक्षण बताए गए हैं।
  • चौथे अध्याय- इस अध्याय में कर्म अकर्म और विकर्म का वर्णन किया गया है इसमें श्री कृष्ण जी कहते हैं कि जब-जब पृथ्वी पर धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है तब तब मैं धरती पर जन्म लेता हूं तता साधुओं की रक्षा के लिए, दुष्ट व्यक्तियों के नाश के लिए मानव के रूप में अवतार लेता हूं।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

  • पाँचवे अध्याय- अध्याय में बताया गया है कि कर्म का मन के साथ संबंध होता है
  • विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
    शुनि चैव श्वपाके च पंडिता: समदर्शिन: ।।
  • छठा अध्याय- इस अध्याय में आत्मसंयम योग के बारे में बताया गया सुख और दुख में मन की स्थिति कैसे बदल जाती हैं इसके बारे में विस्तार से बताया गया है।
  • सातवें अध्याय- इसे बताया गया है कि मैं ही पंचतत्व मन बुद्धि हूं मैं ही संसार की उत्पत्ति करता हूं मैं ही उनका विनाश करता हूं साथ ही इसमें कहा गया है कि मूर्ख व्यक्ति मुझे केवल साधारण मनुष्य समझते हैं।

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।

तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ।।

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।

भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन।।

  • आठवें अध्याय- वैसे तो उपनिषदों में अक्षर विद्या का विस्तार से वर्णन किया गया है लेकिन आठवें अध्याय में अक्षर विद्या का शहर बताया गया है साथ ही इसमें कहा गया है कि मनुष्य बताते जीव और शरीर की सम्मिलित रूप से रचना का नाम ही अध्यात्म है
  • नवें अध्याय- इस अध्याय को राजगुह्ययोग कहा गया है
  • दसवें अध्याय-

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।

कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ ७ ॥

  • ११वें अध्याय- इस अध्याय को विश्वरूपदर्शन योग से जाना जाता है क्योंकि इस अध्याय में अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण का विराट रूप देखा जब अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण का विकट रूप देखा तो अर्जुन अचंभे में पड़ गया।
  • १३वें अध्याय- इस अध्याय में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बारे में बताया गया है इसमें क्षेत्र शरीर को तथा क्षेत्रज्ञ उसको जानने वाला बताया गया है।
  • १४वें अध्याय- अध्याय में सत्व, रज, तम नामक तीन गुणों की व्याख्या की गई है इसमें बताया गया है कि गुरु के वैषम्य से ही विकृत सृष्टि का जन्म होता है।
  • १५वें अध्याय – इस अध्याय में विश्व के अश्वत्थ रूप का वर्णन किया गया है।
  • १६वें अध्याय- इस अध्याय में देवासुर संपत्ति के बारे में बताए गए हैं।
  • १७वें अध्याय- इस अध्याय में सभी प्रकार के गुण तथा तीन प्रकार के आहारों का वर्णन किया गया है।
  • १८वें अध्याय- इस अध्याय में समस्त उपदेशों का सार एवं उपसंहार बताया गया है। इस प्रकार भगवान ने जीवन के उपदेश देकर यह बात कही है कि मनुष्य को चाहिए कि संसार की सभी सच्चाई यों का पालन करें तथा ईश्वर पर विश्वास रखें।

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